काहे को डंडा लेके खड़े हो
साहिब हम तो पहले से मरीज़ हैं
ख़त लिख के बहुत सारे
और बहुत सारे सवाल
बातों के गलियारों में फान्सके
मांगते हो अनगिनत जवाब
चुप रहकर देखो
दर्द का कहना हरवक्त लाजमी नहीं
मन के खुलते ही
शब्दों की लड़ी लगना वाहवाही नहीं
काहे को डंडा लेके खड़े हो
साहिब हम तो पहले से मरीज़ हैं!
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