Friday, July 23, 2010

nangi aankhon se dekhne do

नंगी आँखों से देखने दो
नज़ारा कुछ और दिखता है
आसमान कुछ और नीला
पानी कुछ और साफ़
तारे कुछ और पास
समां कुछ और रंगीला
दिखता है

इंसान कुछ और इंसान
हैवान कुछ और हैवान 
दिखता है
मासूमियत की झलक 
पीड़ा की खनक
आँखों पे पानी
अट्टहास की घूंज
के  एहसास का " एहसास" होता है

आखों की परत पर 
परदे हज़ार हैं 
विचारों के, शब्दों के, रीति-रिवाजों के
की मैं अपनी नज़र भूल गयी

जात-पात, ओहदे की 
चकाचोंध से ये आखें हुयी अंधी
कुछ दिल की गाँठ  खोलकर
आवाज़ को और बुलंद करके
विचारों में नयापन की तलाश है 

नंगी आँखों से देखने दो
नज़ारा कुछ और दिखता है!





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