सोच की स्याही से
लिखूं कुछ अलग शब्द
अपनी परछाई की कोख से
निकलकर चलूँ
कौन, कहाँ, कैसे, क्यूँ
प्रश्नों का बोझा उतारूँ
चहलकदमी की घूंज
समेटकर चलूँ
ख्यालों की दुनिया छोड़कर
कुछ लड़कपन को जीलूं
इस उम्र का पर्दा हर रंग का है
हरा, नीला, कला, पिला &; सुनहरा
किस चिलमन में छिपू
किस परदे से हूँ रूबरू
हर परदे की सिहरन को छूना है
इस पड़ाव के आगे एक और पड़ाव है!
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